Monday, November 7, 2016

एक बालक की पुकार

आजा तारे -चाँद सितारे ,
आजा मेरे घर पर ।
मेरे घर को तू चमकादे ,
अंधियारा तू दूर भगा दे ।
अच्छा नहीं लगता अंधियारा ,
 तू हीं लगता है मुझे प्यारा ।
आजा तारे - चाँद सितारे ,
आजा मेरे घर पर ।
तेरे बिना ना पढ़ सकता मैं  ,
तेरे बिना ना रह सकता मैं ।
कैसे मैं तुझे मनाऊँ ,
कैसे कर मैं तुझे समझाऊँ ।
मैं तुमसे बिनती करता हूँ, तुमसे मैं रो कर कहता हूँ ।
हे आकाश के चाँद -सितारे , सुन ले ईश बालक की बाते ,
कर दे तू अँधियारा दूर , कर दे तू अँधियारा दूर ।

----------------------------- मुकेश कुमार चकर्वर्ती (Mukesh Kumar Chakarwarti)

नोट -  घर पर कोई नहीं है रात का समय है एक बालक अकेले घर पर है और डरा हुवा है , अन्धकार के चलते आकाश के चाँद - सितारों को मना रहा है , उनको फुसिला रहा है अपने मीठी बातों से । 

जीवन के उलझन


उलझन एक अजीब है , जब उलझे संसार |
प्रेम में उलझन , बनती बात ,
प्रेम  उलझकर बना ओ प्यार , इतना सुन्दर ये संसार ||
प्रेम रूपी जब दीप जला तो , खुशियों से खिलता संसार |
खुशिया बहुत निराली है , जब  उलझन बनता प्यार ही प्यार ||
जब उलझन होता झगड़ो का , तब दुनिया बनती खड़हर सा |
इश दुनियाँ (परिवार) में दीप न जलता , तो लगता है आया काल |
काल रूपी जब दीप जला तो , खुशियाँ बनती है जौजाल ||
जब खुशियाँ उठती है ऊपर , तो आते है काल का छाँव |
इश छाँव में जल जाते है , ऊपर -ऊपर के ही पाँव ||
तो लगे कबारन(उजागर)  उन मुर्दो(बात)  को , जो खुशिओं से दबे पड़े थे |
जब कबरन को मुर्दे लागे, तो लागे संसार की दुरी भागे |
छांट - छूँट कर , बाट बूट कर , अलगा हुवा यही संसार |- 2 |
एक ही खून के दो जन्मे थे , लेकिन बात नहीं बनते थे |
एक लगा कुछ बोलन लागे , दूसरा बोलन जोर से लागे ||
इशी बीच में हो गई मार ,
मार मार में हुयी बखेड़ा , बात बढ़ी फैलन को लागे |
तो लगे काबरन उन सब मुर्दो (बात) को , जो न जानत था संसार (समाज) ||
एक कहाँ आव ना आगे , दूसरा कहाँ तू कहें भागे |
यह उलझन ना सुलझ सका , तब  ||
अलग हुवा यही संसार(परिवार)  , अलग हुवा यही संसार (परिवार ) ||

--------------------------------------------- मुकेश कुमार चकर्वर्ती
 
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